Thursday, 31 December 2015

कहाँ हैं अब राजनारायण जैसे जुझारू समाजवादी नेता

कहाँ हैं अब राजनारायण जैसे जुझारू समाजवादी नेता?
गिरीश पंकज

देश आज़ाद  हो चुका था मगर देश के अनेक शहरों में अंगरेज़ों की मूर्तियाँ  हम सबको चिढ़ाते खड़ी थी. महान समाजवादी नेता लोहिया इसे कैसे बर्दाश्त करते।  आदि के इतने सालों तक अंग्रेजों की मूर्तियाँ  खड़ी रहीं, यह कितने शर्म की बात है. डॉ. लोहिया इस बात का विरोध करते रहते थे. आखिरकार उनके आह्वान पर 1965  में अंग्रेजो की मूर्तियों को तोड़ने का पुनीत काम शुरू हुआ. इस काम में बढ़-चढ़ कर भाग लेने वाले एक शख्स का नाम था राजनारायण। 1965  में दिल्ली में लार्ड एडवर्ड की मूर्ति तोड़ने के लिए समाजवादी एकत्र हो गए.  फना गोरखपुरी नामक समाजवादी चीनी-हथौड़ी ले कर ऊपर चढ़ गए और राजनारायण नीचे खड़े हो कर सहयोग करने लगे.रस्सी का एक सिरा  मूर्ति से बांधा गया,  दूसरा छोर राजनारायण ने अपनी कमर से बाँध लिया। जब लगा कि अब मूर्ति टूट सकती है तो उन्होंने दौड़ लगाई।  कमर में रस्सी बंधी हुई थी. बस, मूर्ति टूट कर नीचे गिर गई. साम्राज्यवाद    के एक प्रतीक का पतन देख कर राजनारायण समेत बाकी समाजवादी प्रसन्न हो गए. हालाँकि इस कार्य को करते हुए पुलिस के डंडे भी बरसे लेकिन राजनारायण ने परवाह नहीं की. और एडवर्ड की मूर्ति को धूल चटा कर ही दम लिया। बनारस  में भी उन्होंने रानी विक्टोरिया की मूर्ति को ध्वस्त किया था. 

तो ऐसे साम्राज्यविरोधी थे राजनारायण।  

  'लोकबंधु' की उपाधि से मशहूर रहे अपने समय के  जुझारू नेता राजनारायण का जन्मशताब्दी-वर्ष शुरू हो रहा है। बनारस जिले के एक छोटे-से गाँव मोतीकोट गंगापुर में 1917 को एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में जन्मा एक बालक भविष्य में देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला महानायक बन कर कर उभरेगा, ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन होनहार बिरवान कहीं भी विकसित हो सकते हैं। फिर बनारस की धरती, वहाँ का पानी ही कुछ ऐसा है कि महापुरुषत्व हासिल करने में देर नहीं लगती। बनारस की धरती का संस्पर्श मात्र ने जीवन की सार्थकता को बोध होने लगता है।  राजनारायण जी ने गंगा के तट पर पहलवानी की और आजादी की लड़ाई में अंगरेज़ो के विरुद्ध भी अपने अनेक दाँव पेंच दिखाते रहे। वे अनेक बार जेल भी गए। एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी हम उनका पुण्य स्मरण करते हैं। राजनारायण जी को हम आजादी के पहले के राजनारायण और आजादी के बाद के राजनारायण के रूप में देखें तो हमें सोचना पड़ता है कि समाजवाद के इस नायक का जन्म संघर्ष के लिए ही हुआ था क्या? ऐसे समय में जब राजनीति में अभिजात्य किस्म के लोगों का वर्चस्व था, तब एक ठेठ देहातीपन का ठाट लेकर उभरने वाले नेता को तवज्जो कौन देता? मगर डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने राजनारायण को पहचाना था। आम लोगों ने भी उनके महत्व को समझा था, यही कारण है कि आजादी के दो दशक बाद ही वे जुझारू योद्धा के रूप में एक बार फिर सबके सामने उभरते हैं। तब जब 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी के विरुद्ध रायबरेली राजनारायण ने चुनाव लडऩे की सहमति दी और इतिहास का नया अध्याय ही रच डाला। उस दौर के अनेक बड़े-बड़े नेता  - जैसे चंद्रशेखर और चंद्रभानु गुप्त आदि  इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लडऩे से इंकार कर चुके थे। कारण कुछ भी रहा हो।  उस वक्त इंदिरा एक शक्ति थी। नेहरू की पुत्री के रूप में उनकी ख्याति तो थी ही, एक दबंग प्रधानमंत्री के रूप में भी उनकी लोकप्रियता थी। उनसे लडऩे का मतलब ही था पराजय लेकिन राजनीति में वीरों की कमी नहीं रही है। गढ़ों को भदने के  लिए अंतत: कोई अभिमन्यु ही  सामने आता है। राजनारायण हिम्मत के साथ चुनाव लड़े मगर परिणाम जब आया तो वे पराजित घोषित कर दिए गए। लेकिन किसी शाइर ने कहा है ''हारने का अर्थ यह भी जानिए, जीत की संभावनाएँ साथ हैं''। राजनारायण हारे नहीं। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रायबरेली चुनाव को चुनौती दी और कहा कि ''चुनाव में कदाचरण हुआ है। धांधली हुई है''। मुकदमा चला, प्रमाण दिए गए और अंतत: राजनारायण की विजय हुई.  उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीश जगमोहन जी ने इंदिरा जी के चुनाव को रद्द घोषित कर दिया। उन्हें छह साल के लिए चुनाव लडऩे के लिए भी अपात्र घोषित कर दिया। लेकिन इंदिरा गांधी  की मती मारी गई और उन्होंने लोकतंत्र की पीठ पर छुरा भोकते हुए देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। एक तो राजनारायण ने उन्हें परेशान कर रखा था, दूसरी तरफ पूरे देश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के कारण पूरे देश में कांग्रेस विरोधी वातावरण बन रहा था। कांग्रेस की छवि खराब हो रही थी। अपनी कुरसी बचाने के लिए इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाना और तमाम बड़े-छोटे नेताओं  को  गिरफ्तार करके जेल में ठूँसना ही सरल उपाय नजर आया। और हम सबने देखा कि इसी आपातकाल के कारण इंदिरा का पतन हुआ और जनता पार्टी के रूप में गैर कांग्रेसी गठबंधन ने देश की बागडोर संभाली और पहली बार दिल्ली में गैर कांग्रेसी सरकार काबिज हुई। 

आपातकाल के बाद आम चुनाव हुए उसमें कांग्रेस का पतन हुआ। उसका सूपड़ा ही साफ हो गया। रायबरेली से इंदिरा पराजित हुई और राजनारायण ने जीत का इतिहास रच कर भारतीय राजनीति के इतिहास में अपना अमर स्थान बना लिया। जनता पार्टी की सरकार बिना राजनारायण के अधूरी रहती। इसलिए उनको स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। शायद इसीलिए स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया कि वे उस वक्त साठ साल होने के बावजूद तंदरुस्त थे । उनका कसरती बदन अलग से नजर आता था। माथे पर बंधी हरी पट्टी तो उनकी एक तरह से पहचान ही बन गई थी। उनके खान-पान के किस्से, उनके मनो-विनोद की अनेक खबरें अखबारों में प्रकाशित होने लगी थी। वे कार्टूनिस्टों के एक प्रिय चरित्र भी वे बन गए थे। लेकिन राजनारायण अपने ऊपर बने कार्टूनों से नाराज नहीं होते थे, वरन उसका मज़ा ही लेते थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने देश की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय किए थे। उन्होंने परिवार नियोजन का नाम बदल कर परिवार कल्याण कर दिया था। यह एक सकारात्मक सोच थी। आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन को लेकर देश के लोगों पर अत्याचार किए गए थे। उनका राजनारायण जी को अहसास था। हम इसे  देश का दुर्भाग्य ही कहें जनता पार्टी की सरकार अधिक चली नहीं। जेपी को सपना, देश के लोगों को सपना बहुत जल्दी छिन्न-भिन्न हो गया। जनता पार्टी में टूट-फूट हो गई। राजनारायण के प्रयासों से ही मोरारजी देसाई के बाद चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। ये और बात है किं सिद्धांत की राजनीति करने वाले राजनारायण बाद में चौधरी चरण सिंह से न केवल अलग हुए वरन अपना दल भी बना लिया। 

  राजनारायण जी से मिलने का एक अवसर मुझे रायपुर में मिला था। तब मैंने अपनी पत्रकारिता की यात्रा शुरू ही की थी। युगधर्म नामक अखबार में उप संपादक था। गांधी चौक में राजनारयण जी की आमसभा का आयोजन था।  राजनारायण भाषण दे रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अपनी ही शैली में भला-बुरा कह रहे थे। सभा में संघ के अनेक लोग खड़े थे। उनको बुरा लगा और वे राजनारायण मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। मैं नारे लगाने वालों के पास ही खड़ा था। धीरे-धीरे पथराव की भी नौबत आई और अंतत: सभा भंग हो गई। उस समय मैंने राजनारायण के तेवर निकट से देखे और सुने। राजनारायण जब संघ की निंदा कर रहे थे तो उनके खिलाफ नारे लग रहे थे। गुस्साई भीड़ धीरे-धीरे मंच की तरफ बढऩे लगी तो राजनारायण के समर्थक भी खड़े हो गए, तो उन्होंने माइक से आवाज लगाई -''चिंता मत करो। इन्हें आने दो। ऐसे लोगों से मुझे निबटना आता है।'' खैर इसके बाद तो आम सभा ही नहीं हो पाई। राजनारायण सभा खत्म करके लौट गए। बाद में पत्रकारों से उनकी चर्चा हुई तो उन्होंने वहाँ भी कहा कि देश में समाजवाद ही एक रास्ता है।'' बस, उस समय का इतना ही मुझे याद है. 

गैर कांग्रेसवाद को पुष्पित -पल्लवित  नायको में एक राजनारायण के बारे में जब देखता-सुनता और कहीं पढ़ता हूँ तो सोचता हूँ कि आज  देश में ऐसे महान जुझारू नेता  नज़र क्यों नहीं आते? समाजवाद का नाम लेकर अब मसखरे और पूंजीवादी लोग राज कर रहे है, जबकि राजनीति  में लम्बी पारी खेलने वाले राजनारायण के पास अपना खुद का मकान नहीं था. पारम्परिक घर को छोड़ दे तो।  राजनारायण ऐसे नेता थे जो आज़ादी की लड़ाई में जितनी बार जेल नहीं  गए,उससे की गुना बार आज़ाद भारत में जेल गए. किसान-मजदूर की लड़ाई वे लड़ते ही रहे. उनमें कबीर का फक्क्ड़पन था. अन्याय के विरुद्द घर फूंक कर लड़ने की ताकत थी. कबीर कहते थे जो घर फूंके अपना चले हमारे साथ. राजनारायण उसी सोच के थे , आज के समाजवादीनेताओं की तरह नहीं कि जो घर भर ले अपना चले हमारे साथ. राजनारायण अहर्निश अन्याय के खिलाफ खड़े रहते थे.संघर्ष उनके स्वभाव में था. इसीलिए लोकबन्धु को याद करते हुए उनके जन्मदिन को ''संघर्ष दिवस'' के रूप में मनाया जाता है.उन्होंने दलितों के लिए भी किया। बनारस में बाबा विश्वनाथ मंदिर में दलितों का प्रवेश निषेध था. इस पागलपन के खिलाफ राजनारायण ने १९५६ में जोरदार आंदोलन छेड़ा था. यही कारण है कि समाज  वंचित वर्ग उन्हें अपना नेता मानता था.लोग उन्हें आदर- प्यार से  '' नेताजी'' भी कहते थे.
 
राजनारायण जी   का निधन 1986 में हुआ था. उनको गए तीस साल हो गए हैं. आज  भी उनकी कमी खलती है. एक बार अन्ना हजारे ने कहीं बिलकुल सही कहा था कि आज अगर राजनारायण जी होते तो उनका आंदोलन और गतिशील होता। राजनारायण होते तो देश की राजनीति को वैसा ग्रहण नहीं लगता, जैसा हम देख रहे हैं. राजनारायण के पीछे-पीछे चलने वाले या उनसे बहुत कुछ सीखने वाले अनेक समाजवादी आज समाजवाद की ओर पीठ कर के खड़े हैं.वे समाजवाद का नाम तो लेते है, लोहिया और राजनारायण को याद भी  ,मगर आचरण में समाजवाद नज़र नहीं आता।  ऐसे में राजनारायण जी याद आती है और दुःख होता है कि  लोकबन्धु राजनारायण  जैसे  भारतीय राजनीति के चमकदार चेहरे क्यों भुलाए जा रहे हैं, क्यों उनके जैसा कोई नेता उभर कर सामने नहीं आ रहा है? जन्म शताब्दी के दौरान राजनारायण से सम्बंधित साहित्य का पुनर्प्रकाशन होना चाहिए। उन पर योजनाबद्ध तरीके से देश भर में आयोजन किया जाना चाहिए। और यह काम समाजवादी ही करे। भाजपा सरकार को जो करना है, वो करे मगर समाजवादी लोग अलग से कार्यक्रम करे. परिचर्चा करे और देश के विद्वानो को बुला कर समाजवाद की दिशा पर एक बार फिर गंभीर विमर्श की  शुरुआत कर दें।  आज फिर देश को लोहिया और राजनारायण के आंदोलनो  की जरूरत है.तब शायद राजनारायण जी की आत्मा को भी सुकून मिलेगा। लोकबन्धु राजनारायण पीठ को मेरी  शुभकामनाऍ और धन्यवाद कि उन्होंने राजनारायण जी की शताब्दी को धूमधाम से मनाने का संकल्प किया है.. इससे देश में एक वातावरण बनेगा और नयी पीढ़ी को भी पता चलेगा की उनके देश में राजनारायण नामका एक अलबेला और जुझारू समाजवादी नेता हुआ था.  


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गिरीश पंकज

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*पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली (2008-2012)*
6  उपन्यास, 14  व्यंग्य संग्रह सहित 44  पुस्तके 

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दलित पिछडों के मसीहा राजनारायण

दलित पिछडों के मसीहा राजनारायण…

राजनारायण ने राजनैतिक संघर्ष को जहां वैचारिक स्तर पर धारदार बनाया, वहीं विचार एवं व्यवहार से कार्यकर्ताओं को जोड़े रखा. वे उन विरले नेताओं में थे जो अपने हित को ताक पर रख कर राजनीति एवं साथियों को आगे रखा. 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी के विरूद्ध संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी एवं संगठन कांग्रेस का महागठबंधन होने के वावजूद इंदिरा गांधी से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उनके सिवा कोई तैयार नहीं हुआ. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1977 में बने जनता पार्टी के दौरान लोकसभा चुनाव के लिए उनके सिवा कोई नेता तैयार नहीं हुए. सभी नेता अपनी जीत को सुरक्षित करना चाहते थे, वहीं राजनारायण जोखिम उठा कर स्वयं द्वारा इंदिरा गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट में एवं रायबरेली चुनाव में हराया. उनका यह कार्य राजनैतिक संधर्ष को धारदार बनाने के लिए था. इसका सही मुल्यांकन राजनारायण को अभिनन्दनीय बनाएगा. किंतु भारतीय भद्र समाज राजनाराणय से दुरी बनाते हुए अपनी कायरता को छिपाता था. 1980 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में चौधरी चरण सिंह सर्व श्री रामनरेश यादव, कुअर रेवती रमण सिंह, रमाशंकर कौशिक एवं अन्नतराम जायसवाल आदि (संसोपा) के लोगों को टिक नहीं देना चाहते थे, इस लिए राजनारायण ने चरण सिंह से हट कर नया दल बनाया.
इसके परिणमतः उन्हें विभिन्न कष्टों को झेलना पड़ा. यदपि चरण सिंह राजनारायण के कायल थे तथा इस विवाद से हटा कर उन्हें राज्य सभा भेजना चहते थे. किंतु राजनारायण ने इसे स्वीकार नहीं किया. वे अपने साथियों के लिए कहां तक जा सकते थे उसका यह एक उदाहरण है.
बिहार में राजनारायण कोई भी राजनैतिक कार्य-कलाप करते थे, तो मुझे विश्वास में लेकर ही करते थे. मेरी कर्मठता के कारण बिहार का राजनैतिक परिवेश इसे स्वीकार भी करता था. 12 जून 1975 के इलाहाबाद हाईकोट के फैसले के उपलकक्ष में 19 जून 1975 को पटना गांधी मैदान में राजनारायण की विशाल जन सभा हुई जिसकी अध्यक्षता सभी कि ओर से मेरे लिए निर्धारित की गयी थी. बिहार में उनके सभी कार्यक्रम मेरे ही देखरेख में होते थे. मैं प्रायः सभी कार्यक्रमों में उपस्थित रहता था.
एक बार 1973 में पटना गांधी मैदान में उनका कार्यक्रम कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में होना तय हुआ था, लेकिन उसकी तैयारी मेरी नज़र में समुचित नहीं थी. नेता जी को बनारस से पटना आना था पर फोन पर मेरी असहमती से वे पटना नहीं आये और बनारस से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गये. बिहार में हम और मध्यप्रदेश में चंद्रमणी त्रिपाठी उनके मुख्य सहयोगी थे, वहीं उतरप्रदेश में रामनरेश यादव, मुलायम सिंह यादव, सत्यप्रकाश मालवीय, जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी, रमा शंकर कौशिक, रामशरण दास, बेनी प्रसाद वर्मा, अनंत राम जायसवाल एवं रेवती रमण सिंह जाने जाते थे. अखिल भारतीय स्तर पर नेता जी से जुडे़ नेताओं में बदरी विशाल (हैदराबाद), रवि राय (उडि़सा), रविशंकर पाण्डेय (पश्चिम बंगाल) एवं शांति नाईक (महाराष्ट्र) आदि उल्लेखनीय नाम है जो उनके राजनीतिक सहयोगी एवं उनसे प्रभावित लोग थे.
स्व0 राजनारायण के संबधों के कारण मुझे राजनैतिक नुकसान भी उठाना पड़ा. स्व0 हेमवन्ती नन्दन बहुगुणा मुझे 1990 के लोक सभा चुनाव में बिहार में कांगे्रसी प्रत्याशी बनाना चाहते थे, जिसे मैंने अस्वीकार कर दिया. मेरे जैसे और कईयों के साथ वैसा हुआ होगा. राजनाराण सचमुच महान समाजवादी नेता डॉ0 राममनोहर लोहिया के विचारों के संघर्ष योद्धा थे. वे हमेशा भारतीय इतिहास में आदर के पात्र रहेंगे.
राजनारायण के साथ मेरे पास अनेक उल्लेखनीय संस्मरण है. यथा वे 19 जून 1975 को पटना गांधी मैदान की सभा के बाद तूफान एक्सप्रेस द्वारा मुझे लेकर 20 जून 1975 को पटना से आगरा पहुंच गए. उन दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुक़दमें में इंदिरा गांधी को हराने के कारण देश की राजनीति में वे बहुत चर्चित व्यक्ति हो गये थे. आगरा में 20 जून की शाम को सभा हुई. नेता जी के साथ मेरा भी भाषण हुआ. रात के करीब 11 बजे समाप्त हुई और सड़क मार्ग से दिल्ली जाने का कार्यक्रम तय हुआ. सरकार की ओर से पुलिस स्कोर्ट पार्टी आई जिसे अस्विकार कर दिया गया. खाने के लिए मना कर दिया गया. देर रात तक हम लोग दिल्ली पहुंचे. यह निर्भीकता थी उनमें.
आज जहां पुलिस शैडो रखना और स्कोर्ट पार्टी लेकर चलना नेताओं में रिवाज बन गया है. उन दिनों यह जनतंत्र में अनावश्यक समझा जाता था. बदलते हुए मूल्यों के संदेश को जनता अवश्य ही जवाब देंगी.
नेताजी हाजिर-जवाबी के साथ मजाक भी करते थे, किन्तु उनका मजाक भी गहरा ही संदेश देता था. घटना 1972 की है, राजनारायण जी को दिल्ली जाने के लिए मुजफ्फरपुर से हवाई जहाज पकड़ना था. उन दिनों पटना, मुजफ्फरपुर, लखनऊ एवं दिल्ली रूट पर वायुयान चलते थे. जिस जहाज से नेता जी को जाना था उसी पर पटना से जयप्रकाश नारायण एवं देवकांत बरूआ (बिहार के तत्कालीन राज्यपाल) मुजफ्फरपुर से हवाई यात्रा कर पटना पहुंचे. नेता जी की छड़ी शशिभूषण साहू एम.पी. के पटना घर पर छूट गई थी. जे.पी. ने पूछा कि नेता जी आप की छड़ी क्या हुई. इस पर नेता जी ने कहा कि रघुनाथ गुप्ता ने छिपा दीया है. इस पर जेपी ने कहा कि नहीं ये भोला प्रसाद सिंह को भांजने के लिए दिए हैं. भोला बाबू ने बिहार भूदान यज्ञ कमेटी में यूनियन बना दिए थे, जिससे जेपी नाराज थे.
नेताजी का सामूहिक जीवन कार्यकर्ताओं के साथ खाना-पीना तथा रहना अविस्मरणीय रहेगा. उनके दिल्ली निवास पर विभिन्न प्रदेशों के कार्यकर्ताओं का पड़ाव रहता था. रात में नेता जी ठहरे हुए सभी नेताओं के साथ भोजन करते थे. नेताजी के परिवार के लोग दिल्ली आने पर कार्यकर्ताओं के साथ रहा करते थे. उनके लिए कोई विशेष प्रबन्ध नहीं होता था. यह था उनके सार्वजनिक जीवन का दर्शन…
(लेखक रघुनाथ गुप्ता समाजवादी चिंतक और जेपी आंदोलन के नेता रहे हैं.)
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राज नारायण को देखा नहीं

राजनारायण को देखा नहीं कभी
मैंने राजनारायण को नहीं देखा। उस राजनारायण को नहीं देखा जिसकी तस्वीर दुनिया देखने के लालायित थी। जब उन्होंने अजेय इंदिरा गांधी को न्यायपालिका और जनता की अदालत में हराया तो उनकी तस्वीर देखने के लिए अमेरिका लालायित था। अमेरिका से आने वाले भारतीय बनारस में स्टूडियो से उनकी तस्वीरे खोजते थे।
गांधी जी की तस्वीर तीन लाइनों में कोई कलाकार बना सकता है। राजनारायण की तस्वीर बनाने के लिए कार्टूनिस्ट कांजीलाल दादा को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती होगी। लोको इंजन के चालक की तरह एक रूमाल पेशानी पर बांधने और दाढ़ी खींचने से काम चल जाता होगा। उस राजनारायण को मैंने नहीं देखा।
लोकसभा चुनाव का मतदान हो चुका था। सन 1984 में डबल बूस्टर लगाने पर टेलीविजन दिखता था। मतगणना टेलीविजन वाले घरों में नए साल के जश्न की तरह होता था। आधी रात को बहू बेगम फिल्म रोक दी गई। बागपत के नतीजे प्रसारित किए गए, जिसका सबको पता था। वहां से हनुमान (राजनारायण) राम (चौधरी चरण सिंह ) से लड़ रहे थे और हार गए। तब भी मैंने राजनारायण को नहीं देखा। सन 1977 के चुनाव में गांवों में नासमझी में नसबंदी के तीन दलाल, खा गई राशन, पी गई तेल जैसे नारे लगाए थे। उस समय भी राजनारायण को नहीं देखा था। उस राजनारायण को जिसने लोकतंत्र क्रांति के लोहे पर निर्णायक चोट मारी थी। मैंने इस बात को लड़कपन में नहीं समझा लेकिन जो उस आंदोलन से निकल कर आए उन्होंने क्यों नहीं समझा? यह बात मैं उसी तरह नहीं समझ पाया, जिस तरह राजनारायण को देख नहीं पाया। उस दौर के तमाम नेताओं को मैंने देखा। चौधरी चरण सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, मोरारजी भाई देसाई, दक्षिण से आने वाले नंदमूरि तारक रामाराव को भी लेकिन राजनारायण को क्यों नहीं देखा जबकि वह सबसे करीब के रहने वाले थे। बहुगुणा को अमिताभ बच्चन के हाथों हारते देखा था तब भी राजनारायण को नहीं देख पाया।
गांव में पंडितों ने यजमानों के यहां पूड़ी खाना बंद कर दिया। भोज-परोज में वे खाते ही नहीं थे जब तक कि यजमान उनको दिखा न दें कि खाना देशी घी में बन रहा है। तीसी, बर्रे का तेल उस जमाने में कीमती हो गया था। बताते हैं कि इसमें राजनारायण का हाथ था। उनसे किसी ने वनस्पति तेल में चर्बी मिलाने की बात कही थी और उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया था। आंदोलन गांव-गांव में चला गया। अपने तेल, घी पर लोग भरोसा करने लगे। इस तरह मैंने राजनारायण को महसूस किया, देखा तब भी नहीं।
महसूस उनको तब भी किया जब बनारस में स्वास्थ्य की रिपोर्टिगिं कर रहा था। स्वास्थ्यमंत्री रहते हुए उन्होंने इलाज एकदम मुफ्त कर दिया था। अस्पताल में अठन्नी की पर्ची बनती थी। उनके जाने के डेढ़ दशक बाद उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में यूजर चार्जेज लगने शुरू हुए। उन्होंने गांवों में सेहत की आरंभिक देखभाल के लिए स्वास्थ्य सेवकों की तैनाती की थी। बाद में कांग्रेस की सरकारों को उनकी फिक्र नहीं रही। उनको डेढ़-दो सौ रुपये का मानदेय भी नहीं मिलने लगा। उनमें से तमाम ने झोलाछाप डाक्टर के रूप में काम करना शुरू कर दिया और लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने लगे। उनकी लड़ाई को अपनी आंखों में मैंने देखा लेकिन राजनारायण को तब भी नहीं देखा पाया। आज आशा बहुओं की तैनाती हो गई है गांव-गांव लेकिन तब किसी ने राजनारायण को नहीं सोचा होगा। कागज के रुपये देख कर कोई मुहम्मद बिन तुगलक को याद करता है क्या? तो आशाओं को देख कर कोई राजनारायण को क्यों याद करे?
काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है। मंदिर के मुख्य द्वार पर एक दशक पहले तक एक बोर्ड लगा था, जिसमें लिखा था कि इस मंदिर में सनातन धर्म में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति प्रवेश कर सकता है। अब वह भी हट गया है। यह अनायास नहीं हुआ था। राजनारायण, प्रभुनारायण सिंह सरीखे नेताओं ने 1956 में इसके लिए आंदोलन चलाया था। करपात्री स्वामी जैसे सनातनधर्मियों को बात नागवार गुजरी थी। उन्होंने अलग विश्वनाथ मंदिर स्थापित कर लिया लेकिन भगवान को भी भक्त की दरकार होती है। बाबा विश्वनाथ अपने मंदिर में ही बने रहे और आस्थावानों के केंद्र में रहे। मंदिर में जाते समय कोई कहां सोचता है कि राजनारायण ने उसके पट को विरोध के बावजूद सबके लिए खोलवा दिया था। सनातन और पुरातन नगरी काशी को इस बात पर गर्व हो सकता है कि उस नगरी में प्रायर् सभी मंदिरों में छुआछूत का मर्ज नहीं है। किसी मंदिर में जाते समय मैं क्या कोई नहीं सोचता कि राजनारायण नहीं होते तो क्या होता? संकट मोचन विस्फोट के समय बेरोकटोक मंदिर में जाने से झिझक रही बसपा अध्यक्ष मायावती सम्मान पाकर जब भावुक हो गईं थी, तब उनके जेहन में राजनारायण की छवि उभरी थी या नहीं, नहीं जानता। इतना जरूर जानता हूं कि तब मैंने भी नहीं सोचा था कि राजनारायण को देखा क्यों नहीं?
अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के वे अगुवा थे। विक्टोरिया की मूर्ति उनके नेतृत्व में ही हटाई गई थी। यह बात मैंने सुनी है। इसे उसी तरह नहीं देखा, जैसे राजनारायण को नहीं देखा। बनारस का जिला प्रशासन भी उन्हें कोई मशहूर हस्ती तो मानता नहीं। वेबसाइट में हस्तियों की सूची में तो उनके नाम का उल्लेख उसी तरह नहीं है जिस तरह रविदास का नहीं है। प्रशासनिक वेबसाइट पर मशहूर हस्ती वह भले न हो लेकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में राजनारायण, पिता-अनंत नारायण सिंह, गंगापुर, ही पार्टिशिपेटेड इन फ्रीडम फाइटिंग इन 1942-लिख कर उनका मान जरूर बढ़ाया है। मैंने काफी खोजने के बाद यह बात देखी लेकिन राजनारायण को फिर भी नहीं देखा। राजनारायण के नहीं होने पर इंदिरा गांधी कोर्ट नहीं हारतीं। नहीं हारतीं तो इमरजेंसी नहीं लगती। इमजेंसी नहीं लगती तो तमाम लोग का वजूद भले ही होता लेकिन उनके होने के मायने नहीं होते। उनकी तरह राजनारायण की अनदेखी नहीं कर रहा बल्कि सिर्फ इतना कह रहा हूं कि बस मैंने उनको देखा नहीं।
-अजय राय
 

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